GAUTAM BUDDHA KI KUCH KAHANIYA

GAUTAM BUDDHA KI KUCH KAHANIYA
GAUTAM BUDDHA KI KUCH KAHANI
गौतम बुद्ध का बचपन का नाम सिद्धार्थ था। यह  कहानी उनके बचपन की हैं।

दयालु सिद्धार्थ  -

एक बार सिद्धार्थ अपने बगीचे में टहल रहा था। तभी उनके सामने एक बाण से घायल हंस आ गिरा। उन्होंने  उस हंस को उठाया और बाण निकाल दिया और उसके घाव को साफ करके मरहम लगाकर गोद में रखकर उसे सहला रहे थे। तभी उनका चचेरा भाई देवदत वहाँ आया और कहने लगा, ये हंस मेरा है, मैंने इसे बाण मारकर निचे गिराया है। सिद्धार्थ ने कहा नहीं ये हंस मेरा है मेने इसे बचाया है, हंस मर जाता तो में दे देता तुम्हें। इस तरह दोनों में तर्क होने लगा अंत में दोनों ने राजा के पास जाने का फैसला किया। राजा के सामने दोनों उपस्थित हुए। राजा ने पूछा क्या बात है सिद्धार्थ ने कहा मेने इस हंस को बचाया है, देवदत ने इस हंस को बाण से घायल कर दिया था और अब ये हंस मांग रहा है। राजा ने देवदत से कहा क्या ये सच बोल रहा है ?
देवदत ने कहा ने कहा- महाराज मेने इस हंस का शिकार किया है इसलिए ये हंस मेरा है। राजा ने दोनों की बात सुनने के बाद अपना निर्णय दिया - "मारने वाले से जीवन की रक्षा करने वाला का अधिकार उस जीवित प्राणी पर अधिक होता है।" इसलिए ये हंस सिद्धार्थ  का हैं।
उसके बाद सिद्धार्थ ने उस हंस को सवस्थ कर आकाश में उड़ा  दिया। सिद्धार्थ बहुत दयालु थे उन्होंने कभी प्राणियों का शिकार करना पसंद नहीं किया।

किसा गौतमी की पुत्र शोक 

  गौतम बुद्ध ने अपने विचारो से स्त्रियों का भी उद्धार किया। एक बार किसा गौतमी नाम की एक स्त्री के पुत्र की मृत्यु हो गयी। वह पूरी तरह से शोक में डूब गयी। वह गौतम बुद्ध के पास अपने पुत्र को लेकर गयी और बोली प्रभु आप मेरे पुत्र को जीवित कर दीजिये। भगवान बुद्ध ने कहा अवश्य कर दूंगा लेकिन तुम सबसे पहले उस घर से सरसो लेकर आओ जिस घर में किसी की मृत्यु नहीं हुयी हो। वह पुरे गांव घूम आयी उसे कोई भी घर नहीं मिला। वह बुद्ध के पास आयी। बुद्ध ने उसे समझाया कि इस संसार के हर जीव को एक न एक दिन मरना ही पड़ेगा। मृत्यु अटल है, जीवन-मरण का यह चक्र चलता रहता है। इसलिए शोक छोड़ो और आगे बढ़ो  किसी भी  चीज को पकड़ के मत बैठो।

डाकु अंगुलिमाल

बुद्ध अपने शिष्यों के साथ एक गांव पहुँचे। वहां गांव वालों ने उनका  बड़े आदर के साथ स्वागत किया। उस गांव के लोग उस समय एक डाकू से बहुत आतंकित थे। वह डाकू उस गांव के पास ही के जंगल में रहता था जो  इंसान उस रास्ते से पार होता, वह उसे लूट लेता और उसकी हत्या कर उसके एक अंगुली काट कर अपने गले में माला बनाकर पहनता। इसलिए सब उसे अंगुलिमाल कहते थे। जब भगवान बुद्ध जाने लागे उसी जंगल के रास्ते से तो गाँव वालों ने रोका और उन्हें पूरी बात बतायी। यह सुनकर गौतम बुद्ध अकेले उस रास्ते पर जाने लगे। जंगल में प्रवेश करते ही अंगुलिमाल उनके पास आया और कहा जो कुछ भी तुम्हारे पास है, वह मुझे दे दो। बुद्ध ने कहा मेरे पास कुछ नहीं है। अंगुलिमाल ने कहा तुम्हे डर नहीं लगता मुझसे, तुमने मेरे बारे में नहीं सुना है में कितना खतरनाक और शक्तिशाली हूँ। बुद्ध ने कहा तुम शक्तिशाली हो इसका क्या प्रमाण है तुम्हारे पास,  में जो कहूँ क्या तुम वो कर सकते हो। अंगुलिमाल हंसने लगा और कहा हाँ में सब कुछ कर सकता हूँ बताओ क्या करुँ। बुद्ध ने कहा उस नीम के पेड़ से जाओ 4 पत्ते तोड़ के लाओ। अंगुलिमाल हंसने लगा और कहा बस इतनी सी बात अभी लाता हूँ। उसने वो पत्ते तोड़ कर बुद्ध के सामने आया। बुद्ध ने कहा जाओ अब वापस उस पत्ते को उस पेड़ पर लगा दो। अंगुलिमाल ने कहा ये कैसे हो सकता है टूटे हुए पत्ते फिर से पेड़ पर कैसे लग सकते है।
बुद्ध ने कहा जब तुम ये छोटी चीज नहीं कर सकते और तुम अपने आप को शक्तिशाली कहते हो। अगर तुम किसी चीज को जीवन नहीं दे सकते तो तुम्हे जीवन लेने का भी अधिकार नहीं है। बुद्ध के वचन सुनकर वो पूरी तरह बदल गया, उसने बुरे काम छोड़ दिये और वह बुद्ध का शिष्य बन गया। और इस तरह से वह गांव एक भयानक डाकू से मुक्त हो गया। 

GAUTAM BUDDHA KI KUCH KAHANIYA


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